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हौसलों की दुकान: ई-रिक्शा बना साइबर कैफे, जीजा–साले ने मजबूरी को बनाया ताकत

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नालंदा। जिंदगी जब इम्तिहान लेती है तो कई लोग टूट जाते हैं, लेकिन कुछ लोग उसी संघर्ष से अपनी नई राह गढ़ लेते हैं। नालंदा के दो युवाओं—जीजा आयुष कुमार और साले कुंदन पटेल—ने आर्थिक तंगी के बीच ऐसा ही अनोखा रास्ता चुना है। शहर में दुकान खोलने के पैसे नहीं थे, तो इन्होंने ई-रिक्शा को ही चलता-फिरता साइबर कैफे बना दिया।

कर्ज और जिम्मेदारियों से शुरू हुआ सफर

रहुई प्रखंड के गैबी गांव निवासी कुंदन पटेल के जीवन में मुश्किलों का पहाड़ तब टूटा जब माता-पिता का साया उठ गया। पिता के इलाज में परिवार पर लगभग 10 लाख रुपये का कर्ज हो गया। पढ़ाई जारी रखने के साथ पेट पालना बड़ी चुनौती थी। कुंदन ने सोचा था कि शहर में साइबर कैफे खोलेंगे, लेकिन महंगे किराये ने हिम्मत तोड़ दी। तभी दिमाग में विचार आया—क्यों न ई-रिक्शा को ही दुकान बना दिया जाए।
आज वही ई-रिक्शा गांव-गांव घूमकर लोगों को डिजिटल सेवाएं दे रहा है।

सरकारी नौकरी का सपना अब भी जिंदा

एमए और आईटीआई की पढ़ाई कर चुके कुंदन का सपना रेलवे में लोको पायलट बनने का है। दिन में ई-रिक्शा पर काम और रात में पढ़ाई—यही उनकी दिनचर्या है। वे कहते हैं, “कर्ज भी उतारना है और सरकारी नौकरी भी लेनी है, इसलिए मेहनत से पीछे नहीं हटूंगा।”

जीजा का मिला साथ

इस संघर्ष में उनका साथ दे रहे हैं जीजा आयुष कुमार। इलेक्ट्रॉनिक्स कम्युनिकेशन में डिप्लोमा कर चुके आयुष कभी टेक्निकल इंजीनियर बनना चाहते थे, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों ने राह बदल दी। फैक्ट्री, प्लंबर जैसे काम करने के बाद उन्होंने साले के साथ यह अनोखी पहल शुरू की।
आयुष बताते हैं कि रोज 500 से 1000 रुपये तक की कमाई हो जाती है, जिससे घर का खर्च चल जाता है।

गांव तक पहुंच रही डिजिटल सेवा

यह जोड़ी फेसबुक पर लाइव आकर अपने लोकेशन की जानकारी देती है। लोग फोन कर इन्हें बुला लेते हैं। ये जाति–आय–निवास प्रमाण पत्र, पेंशन फॉर्म, बिजली बिल, केवाईसी, ऑनलाइन आवेदन जैसी सेवाएं सीधे लोगों के दरवाजे पर उपलब्ध कराते हैं। खासकर बुजुर्गों के लिए यह सुविधा वरदान साबित हो रही है।
बन गए मिसाल

बिना दुकान, बिना बड़े संसाधन के शुरू हुई यह पहल आज नालंदा में चर्चा का विषय है। जीजा–साले की यह जोड़ी बता रही है कि सपने हालात के मोहताज नहीं होते—हिम्मत हो तो ई-रिक्शा भी उम्मीदों की दुकान बन सकता है।

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